Sunday, 29 March 2015
Jharokha: Visits to the United States of America
Jharokha: Visits to the United States of America: First visit: 5 June 2001 to 14 August 2001: Sunnyvale, Las Vegas, San Diego, Los Angeles (California) Second visit: 8 Feb 2003 to 3 June 20...
Saturday, 28 March 2015
Visits to the United States of America
First visit: 5 June 2001 to 14 August 2001: Sunnyvale, Las Vegas, San Diego, Los Angeles (California)
Second visit: 8 Feb 2003 to 3 June 2003: Sunnyvale, lake Tao, Napa valley vineyards
Third visit: 17 May 2005 to 18 November 2005 : saw the Grand Prix at San Jose, Los altos - art of wine festival, Felton.
Fourth visit: 19 September 2006 to 17 February 2007: Cupertino
Fifth visit: 25 May 2011 to 21 November 2011: california, Washington DC, Newyork, Niagara Falls and the surrounding areas, Chicago




Friday, 24 October 2014
उद्बोधन:-----------
अंधकार में कितने अबतक, मंगलदीप जलाये मैंने ?
कितनी रोती आँखों के , दु:ख अश्रु पोंछें मैंने ?
कितने गिरते दीन जनों को , दिया सहारा स्वयं दौड़कर ?
कितनी मेट सका हूँ दूरी , सबको अपना बन्धु बनाकर ?
मैं सबमें हूँ , सब हैं मुझमें , मैं सबका हूँ,सब हैं मेरे ।
साम्य योग के उक्त मंत्र से, तोड़ सका हूँ कितने घेरे ?
- राष्ट्र सन्त गुरूदेव उपाध्याय अमरमुनि जी द्वारा रचित -
Monday, 20 October 2014
अहिंसा दर्शन :--------
जैन - धर्म दृढ़तापूर्वक कहता है कि वह मैल आत्मा पर लगा हुआ होता है।अत: दुनियाभर के तीर्थों में क्यों भटका
जाए ? सबसे बड़ा तीर्थ तो अपनी आत्मा ही होती है,क्योंकि उसी में अहिंसा और प्रेम की निर्मल धाराएॅ बहती हैं। उसमें ही डुबकी
लगा लेने से पूर्ण शुद्धता प्राप्त होती है। जहाँ अशुद्धि है, वहाँ की ही तो शुद्धि करनी है। जैन दर्शन बड़ा आध्यात्मिक दर्शन है, और
वह इतना ऊँचा भी है वह मनुष्य को मनुष्यत्व के अन्दर बन्द करता है । मनुष्य की दृष्टि मनुष्य में डालता है। अपनी महानता अपने
ही अन्दर तलाश करने को कहता है ।
व्यक्ति अपना कल्याण करना चाहता है, किन्तु प्रश्न उठता है कि कल्याण करें भी तो कहाँ करें? यहाँ पर जैन -
धर्म स्पष्टत: कहता है कि - जहाँ तुम हो,वहीं पर,बाहर किसी गंगा या और किसी नदी पहाड़ में नहीं । आत्म कल्याण के लिय,जीवन
शुद्धि के लिए या अन्दर में सोए हुए भगवान को जगा ने के लिए एक इंच भी इधर उधर जाने की ज़रूरत नहीं है। तू जहाँ है ,वहीं
जाग जा और आत्मा का कल्याण कर ले ।
Wednesday, 15 October 2014
स्मृतियाँ :--------
ओ निर्मम पाषाण हृदय ------
देखता हूँ कब तलक,तुम मौन एेसे रह सकोगी ।
कब तलक उर की व्यथा को,तुम अकेली सह सकोगी ।।
'और अपने से सदा ही रूठते' जंग का नियम है ।
रूठ कर भी याद कर लेती मुझे,क्या देवि कम है ।।
मौन रूठे मीत ! तुमको आज में,अपना बनाना चाहता हूँ ।
मूक अन्तर में तुम्हारे प्यार का दीपक जलाना चाहता हूँ ।।
नीड़ में अपना बसाना चाहता हूँ,तुम्हें किस नाम से पुकारू ?
यह शब्द- निर्धन व्यक्ति तुम्हें उपयुक्त शब्द भी तो भेंट नहीं कर सकता,फिर यह मसिपात्र
और हृदय दोनों ही तो स्याह रंग के हैं ।तुम्हारे लिये पाक एवं मृदु शब्द कहाँ से लाऊँ ।मुझ
जैसे नादान वेबस के पास तो भट्टी के अँगारों जैसे कर्कश शब्दों के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं
जिनको कि मैं पद्य की प्रथम पंक्ति म ें ही भेंट कर चुका हूँ ।
जगदीश प्रसाद जैन
Sunday, 21 September 2014
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