Thursday, 22 July 2021
Tuesday, 20 October 2020
Friday, 18 September 2020
Monday, 14 September 2020
LORD MAHAVIRA. :----------24rth.Thirthanker Bhawan Mahavir Swamiji--- Birth in year 599 B.C.-Birthplace:- Kshatriyakund, Vaishali
भगवान महावीर स्वामी जी का जन्म वैशाली के वाज्जिकुल में बसोकुंड (बसाढ ) ग्राम में ईसा से ५९९ वर्ष पूर्व हुआ था। आजकल वैशालीि ज़िला का मुख्यालय हाजीपुर है,यह पटना रेलवे स्टेशन से ७० किलो है। आपके पिता का नाम सिद्धार्थ और माता का नाम
त्रिशला था।आपका विवाह यशोंदा नाम की कन्या से हआ था,इसके पश्चात एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम प्रियदर्शनी था।
आपको ४२ वर्ष की उम्र में केवल्यज्ञान प्राप्त किया था।आापने ७२ वर्ष की उम्र में ( ईसा से ५२७ पूर्व ) पावापुरी में निर्वाण प्राप्त
किया था।यह स्थान पटना रेलवे स्टेशन से ९४ किलो मीटर की दूरी पर है।यह स्थान विहार प्रान्त के शहर (विहार शरीफ़ ) ज़िला
नालन्दा में स्थित है।यह पावापुरी तीर्थ में भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण स्थल जहाँ भगवान के पूज्य चरण स्थल को जलमन्दिर
के नाम से भी जाना जाता है।पावापुरी, जिसे पावा भी कहा जाता है।यह जैन धर्म के मतावलंबियों के लिये एक अत्यंत पवित्र शहर है,क्योंकि माना जाता है कि भगवान महावीर स्वामी जी को यहाँ ही मोक्ष प्राप्त हुआ था।यहाँ के जलमन्दिर की शोभा देखते ही बनती है।पूरा शहर केमूर की पहाड़ियों पर बसा हुआ है।
Tuesday, 21 July 2020
मेरे बचपन के संस्मरण की घटना की सत्य कहानी:----
मेरा बचपन पुलछिंगा मोदी लोहामंडी में व्यतीत हुआ था।इसी स्थान के आसपास ज़्यादातर अग्रवाल लोहिया जैन समाज के लोग रहा करते थे।इसी स्थान पर एक जैन श्वेत्मबर स्थानकवासी स्थानक था।यहाँ सभी जैन समाज के लोग इकट्ठा होकर उपासना करते
थे।इसी जैन समाज के अच्छे परिवार का एक व्यक्ति श्री घनश्याम दास जैन के नाम आया और इसी समाज एवं परिवार के इस व्यक्ति को कम समझ होने की वजह से परिवार एवं समाज से तिृष्कृति होने की वजह से,इसी मोहल्ले के बच्चे चिडाते और परेशान
करते थे।इह दिमाग़ से भी बहुत कमज़ोर चिड़चिड़ा रहता था।और कुछ पागलपन की भी हरकतें करता और कभी श्मशान स्थान पर
जाकर सो जाया करता था।जिसकी वजह से मोहल्ले के बच्चे उसको घासीराम भूत के नाम से भी सम्बोधित करते थे।वह अपने को
कृष्ण भगवान का अवतार कहता था और बच्चों को कृष्ण की लीलाओं का नाटक करके नाचता गाता रहता था।कभी कभी वह अपने सहारे के डन्डे को बाँसुरी का रूप बना अपने होटो के पास लगा कर कृष्ण की लीला का नाटक करने लगता था।मौहल्ले के
बच्चे उसको चिडाते और उसके ऊपर पत्थर के छोटे छोटे टुकड़े फेंकते ,उस समय वह अपना रौद्र रूप धारण करता और सबको
गालियाँ बकता और कहता तुम सब रावण की सन्तान हो और तुम्हारी लंका में आग लग जावे और तुम जल कर भष्म हो जाओ।
इस प्रकार बच्चों को गाली बकता हुआ,तुम रावण की औलाद हो,कहता हुआ दौड़ाता था।इसी तरह की हरकतें करता हुआ वह
अपना जीवन निर्वाह कर रहा था।जीवन की ठोकरों से उकताये हुये राही की तरह,अपने लड़खड़ाते हुये क़दमों से,अपने जीवन की
अंतिम मन्जिल को लकड़ी के डन्डे के सहारे तय कर रहा था।मृत्यु भी उसके जीवन की दुर्दशा पर अट्टहास कर रही थी।काल भी
उसके कंकाल को हड़पने के लिये तैयार बैठा था।समाज और संसार की निगाहों में वह पागल,लाचार दिखाई पड़ता था।किन्तु
सत्यता तो यह है,कि लोहामंडी के बच्चों एवं समाज के ही कुछ लोगों ने,अपने हास्य परिहास्य का आनन्द लेने के लिये उसको
पागल,लाचार एवं भूत का रूप दिया हुआ था।
Thursday, 16 July 2020
Subscribe to:
Posts (Atom)


